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न्यूटन के गति का प्रथम नियम या जड़त्व (Inertia) का नियम

न्यूटन के गति का प्रथम नियम को समझने से पहले यह जान लेते हैं की जड़त्व क्या होता है?

जड़त्व (Inertia) – दैनिक जीवन में हम पाते हैं की किसी वस्तु को गत्यावस्था या विरामावास्था में लाने के लिए उस पर बल लगाना पड़ता है। यदि टेबल पर एक पुस्तक रखी हुई है तो पुस्तक टेबल पर उस समय तक रखी रहेगी जब तक की बाह्य बल आरोपित न किया जाए अर्थात पुस्तक स्वतः ही अपनी अवस्था में परिवर्तन करने में असमर्थ है।

यदि एक गेंद घर्षण रहित फर्श पर लुढ़क रही हो तो वह उसी वेग से उसी दिशा में उस समय तक लुढ़कती रहेगी जब तक उसे बाह्य बल लगाकर रोका न जाये। फलस्वरूप हम पाते हैं कि फर्श पर लुढ़कती गेंद कुछ दूरी तय करने के पश्चात रुक जाती है, क्योंकि फर्श और गेंद के सम्पर्क सतहों के बीच गति विरोधी घर्षण बल कार्य करता है, किन्तु यदि घर्षण बल शून्य हो तो गेंद उसी वेग से उसी दिशा में चलती रहेगी। इस प्रकार प्रत्येक वस्तु स्वतः ही अपनी विरामावस्था या ग्त्यावास्था में परिवर्तन करने में असमर्थ होती है। किसी वस्तु के इस गुण को ही जड़त्व कहते हैं।

स्पस्ट है कि ”जो वस्तु स्थिर है वह स्थिर रहेगी और जो वास्तु गतिशील है वह उसी वेग से उसी दिशा में तब तक चलती रहेगी, जब तक कि उस पर  कोई बाह्य बल न लगाया जगाया जाये।” यही न्यूटन के गति का प्रथम नियम (Newton’s first law of motion) कहलाता है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  1. न्यूटन ने गति के तीनों नियमों का प्रतिपादन अपनी प्रसिध्द पुस्तक ‘प्रिन्सीपिया’ में किया है।
  2. गति का प्रथम नियम जड़त्व का नियम कहलाता है।
  3. न्यूटन के गति का प्रथम नियम बल की परिभाषा बतलाता है।
  4. बल किसी वस्तु की ग्त्यावस्था, विरामावस्था, आकृति, या आकार में परिवर्तन कर देता है।

न्यूटन के गति के प्रथम नियम से स्पस्ट है की यदि कोई वस्तु विरामावस्था में है तो उसे गत्यावस्था में लाने के लिए उस पर बल लगाना होगा। उसी प्रकार यदि कोई वस्तु नियत वेग से एक सरल रेखा में चल रही है तो उसके वेग में परिवर्तन करने के लिए उस पर बल लगाना होगा। यह भी स्पस्ट है कि वस्तु की गति की दिशा में परिवर्तन करने के लिए उस पर बल लगाना पड़ेगा।

न्यूटन के गति का द्वितीय नियम

यदि कोई वास्तु एक समान वेग से गतिमान हो तो गति के प्रथम नियम से उस पर नेट बल (Net Force) का मान शून्य होगा। अब यदि उस वस्तु पर एक बाह्य बल लगा दिया जाये तो उसका वेग फलस्वरूप उसका संवेग भी परिवर्तित हो जायेगा। न्यूटन का गति का द्वितीय नियम किसी वस्तु पर लगाए गए बल उसके और संवेग में होने वाले परिवर्तन की दर में सम्बन्ध बताता है, जो निम्नानुसार है-

  1. यह नियम बल को मापने का तरीका बतलाता है।
  2. बल = द्रव्यमान X त्वरण।
  3. बल का S.I. मात्रक न्यूटन है।
  4. यह नियम मूलभूत नियम है, क्योंकि इससे गति का प्रथम और तृतीय नियम व्युत्पन्न किये जा सकते हैं।
  5. बल का आवेग=संवेग में परिवर्तन
  6. ∆p = F.∆t

न्यूटन के गति का तृतीय नियम (newton’s third law of motion)

इस नियम के अनुसार ”प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।” यदि एक टेबल पर एक पुस्तक को रख दें तो पुस्तक अपने भार के कारण टेबल पर नीचे की ओर बल लगाती है। न्यूटन की गति के तृतीय नियम के अनुसार टेबल भी पुस्तक पर उतना ही बल ऊपर की ओर लगाती है। पुस्तक द्वारा टेबल पर लगाए गए बल को क्रिया बल (action) और टेबल द्वारा पुस्तक पर लगाए गए बल को प्रतिक्रिया बल (Reaction) कहते हैं।

न्यूटन के गति के तृतीय नियम के अनुसार-

  1. प्रत्येक क्रिया के बराबर विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।
  2. यह नियम बतलाता है कि बल सदैव जोड़े के रूप में होते हैं।
  3. क्रिया और प्रतिक्रिया बल भिन्न-भिन्न वस्तुओं पर कार्य करते हैं।

न्यूटन के अनुसार गति के तृतीय नियम के उदाहरण

  1. यदि कुएँ में से पानी से भरी बाल्टी खींचते समय डोरी टूट जाती है तो खीचने वाला व्यक्ति पीछे की ओर गिर जाता है। व्यक्ति द्वारा डोरी पर लगाया गया बल क्रिया है। इसके विपरीत प्रतिक्रिया बल डोरी के तनाव के माध्यम से बाल्टी पर लगता है। जब डोरी टूट जाती है तो प्रतिक्रिया लुप्त हो जाती है। अतः व्यक्ति क्रिया बल के कारण पीछे की ओर गिर जाता है।
  2. रायफल से गोली दागते समय रायफल चलाने वाले को पीछे की ओर धक्का लगता है। इसका कारण यह है कि जब रायफल चलायी जाती है तो बारूद के विस्फोट के कारण गोली तीव्र वेग से आगे की ओर बढ़ती है, रायफल पर उतना ही प्रतिक्रिया बल पीछे की ओर लगता है। अतः रायफल चलाने वाले को पीछे की ओर धक्का लगता है।
  3. जब नाव पर सवार व्यक्ति नाव से किनारे पर कूदता है तो वह नाव को अपने पैरों से पीछे की ओर दबाता है। नव भी विपरीत दिशा में व्यक्ति पर प्रतिक्रिया बल लगाती है जिसके कारण व्यक्ति किनारे की ओर उछलने में समर्थ होता है।

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