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गंगा पुत्र भीष्म का जन्म तथा जीवन की कहानी हिंदी में

भीष्म महाभारत कथा के सबसे श्रेष्ट पात्र थे तथा कौरव-पांडव में सबसे जेष्ठ थे इसलिए उन्हें पितामह भी कहा जाता था। भीष्म शांतनु तथा गंगा के पुत्र थे उनका वास्तविक नाम देवव्रत था। उन्होंने भगवान् परशुराम से शिक्षा ग्रहण की थी। इनको अन्य नाम गाँगेय, शांतनव, नदीज, तालकेतु आदि से जाना जाता है। देवव्रत ने अपने पिता शान्तनु का सत्यवती से विवाह करवाने के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य रहने की अखण्ड प्रतिज्ञा की थी जिससे उनका नाम भीष्म पड़ा गया। पुत्र द्वारा इस तरह की पितृभक्ति देखकर महाराज शांतनु ने देवव्रत को इक्षामृत्यु का वरदान दिया था। महाभारत युद्ध में वे दस दिनों तक सेनापति पद पर रहकर कौरव सेना का प्रतिनिधित्व किया। अंत में अर्जुन के बाणों द्वारा पितामह भीष्म निष्क्रिय होकर बाणों की शारश्या पर लेट गए।

गंगा पुत्र भीष्म का जन्म
भीष्म पितामह
नाम देवव्रत
अन्य नामभीष्म, गंगापुत्र, पितामह
जन्म स्थलहस्तिनापुर
पिताशांतनु
मातागंगा
भाई-बहनवेदव्यास , चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य (सभी सौतेले भाई)
शस्त्रधनुष बाण
गुरुभगवान् परशुराम

पूर्व जन्म की कहानी

देवव्रत तथा उससे पहले जन्में गंगा की सातो संतानें पिछली योनि में वसु थे। एक बार ये सभी मेरू पर्वत पर भ्रमण कर रहे थे और भ्रमण करते-करते महर्षि वशिष्ठ के आश्रम के समीप पहुंच गए। उस समय महर्षि वशिष्ठ अपनी कामधेनु गाय और उसकी बछड़ी नंदिनी को आश्रम के बाहर बांधकर किसी विशेष कार्य से कहीं गए थे। उस सुंदर बछड़ी नंदिनी को देखकर द्यौ नाम के एक वसु के मन में विचार आता है कि इसे मैं अपनी पत्नी को भेंट करूंगा तो वह बहुत प्रसन्न होंगी और वह उसे आश्रम से चुराकर ले जाता है जिसका विरोध अन्य वसुओं ने नहीं किया। जब वशिष्ठ जी आश्रम आए तो उन्होंने दिव्य दृष्टि से वसुओं की उदण्डता को देख लिया।

वसुओं की इस उदण्डता पर वशिष्ठ जी को बहुत क्रोध आया और उन्होंने सभी को श्राप दे दिया कि मृत्युलोक पर मनुष्य योनि में जन्म होगा। इसके बाद सभी वसुओं ने वशिष्ठ जी से क्षमा याचना की इस पर महर्षि वशिष्ठ जी ने कहा दिया हुआ श्राप वापस नहीं हो सकता पर बाकी वसुओं को जल्दी ही मनुष्य जन्म से मुक्ति मिल जाएगी लेकिन द्यौ नाम के वसु ने जो अपराध किया है वह क्षमा करने योग्य नहीं है। इसलिए इसे लम्बे समय तक मृत्युलोक में रहना होगा और दुःख भोगने पड़ेंगे।

शांतनु तथा  गंगा

एक बार महाराज शांतनु गंगा नदी के किनारे विश्राम कर रहे थे तभी वहां अचानक सुंदर स्त्री प्रकट हुई। शांतनु उस स्त्री को देखकर मोहित हो गए। शांतनु उस स्त्री से कुछ कहते परंतु वे हस्तिनापुर राजा थे इसलिए ऐसा करना उन्हें उचित नहीं लगा और वो स्त्री वापस नदी में समा गई। ऐसा कई दिनों तक चलता रहा महाराज शांतनु प्रतिदिन गंगा किनारे आते और उस उस स्त्री के आने की प्रतीक्षा करते।

एक दिन महाराज ने उस स्त्री से बात करने का निश्चय किया और जैसे ही वह स्त्री प्रकट हुई महाराज उसके समीप जाकर बोले हे सुंदरी मेरा नाम शांतनु है और मैं हस्तिनापुर का सम्राट हूं। मैं आपकी सुंदरता पर मोहित हो गया हूं। यदि आपकी सहमति मिले तो मैं आप से विवाह करना चाहता हूं।

उस स्त्री ने मुस्कुराकर महाराज की देखकर बोली महाराज मैं आपसे विवाह करने के लिए तैयार हूं परंतु आपको मुझे एक वचन देना होगा। मैं जो भी करूंगी आप उसके विषय में कभी भी मुझसे कोई प्रश्न नहीं करेंगे। जिस दिन आपने मुझसे प्रश्न किया मैं उस दिन आपको छोड़ हमेशा के लिए चली जाऊंगी। महाराज बिना कुछ सोचे समझे उसे वचन देकर विवाह कर लिया।

विवाह के पश्चात जब महाराज की पहली संतान हुई तो महारानी उसे लेकर गंगा नदी की ओर चल पड़ी। यह देखकर दासी हैरान हो गई और उसने तुरंत महाराज को इसकी सूचना दी। महाराज गंगा का पीछा करते नदी की ओर गए और देखा कि उस नन्हें से बच्चे को महारानी नदी में रही थीं। महाराज शांतनु वचनबद्ध थे इसलिए वह कुछ कर न सके। इस प्रकार गंगा ने महाराज शांतनु में की सात संतानों को पानी में बहा दिया।

जन्म

जब गंगा का आठवाँ पुत्र हुआ और वह उसे भी नदी में बहाने के लिये ले जाने लगी तो राजा शान्तनु खुद को रोक ना सके और उसने गंगा से पूछा तुम मेरे सात पुत्रों को पानी में बहा चुकी हो मैंने तुमसे कुछ नहीं कहा क्या तुम्हारे अंदर ममता नहीं है। हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए यह बालक मुझे दे दो।

यह सुनकर गंगा बोली हे राजन् आपने अपना वचन तोड़ा है। इसलिए मैं आपके साथ नहीं रह सकती। मैंने आपके जिन पुत्रों का नदी में बहाया वह सब ऋषि वशिष्ठ द्वारा दिए श्राप से श्रापित थे जो मुक्त हो चुके हैं। परंतु अभी इस बालक का श्राप पूरा नहीं हुआ है, इसे धरती पर रहकर और दुखों का भोग करना होगा। इसलिए मैं इस बच्चे अपने साथ ले जा रही हूं। यह बालक मेरे पास आपकी धरोहर के रूप में रहेगा। सही समय आने पर मैं इसे आपको सौंप दूंगी।

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शांतनु और देवव्रत

गंगा के चले जाने के बाद महाराज शांतनु को एक ही उम्मीद थी कि एक दिन गंगा उस बालक वापस करने आएगी। एक दिन महाराज शांतनु को सूचना मिली कि किसी ने गंगा नदी पर बांध बना दिया है जिससे प्रवाहित नहीं हो रहा है। महाराज शांतनु ने इसे शत्रु सेना की चाल समझकर तुरंत नदी की ओर प्रस्थान किया। कारण का पता लगाने जब महाराज शांतनु आगे गए तो उन्होंने देखा एक सुंदर युवक अस्त्रों का अभ्यास कर रहा है तथा अपने बाणों के प्रभाव से नदी धारा रोक दी है।

ऐसा दृश्य देखकर महाराज शांतनु आश्चर्य में पड़ गए। तभी वहां उनकी पत्नी गंगा प्रकट हुई और उसने शांतनु को बताया महाराज यह आपका ही पुत्र है। इसकी बुद्धि और कौशल को देखकर इसका नाम देवव्रत रखा है। इसने भगवान परशुराम से शस्त्र विद्या प्राप्त किया है। देवव्रत का शांतनु से परिचय करा कर तथा उसे महाराज को सौंप कर गंगा वहां से अंतर्ध्यान हो गई।

महाराज शांतनु देवव्रत को लेकर हस्तिनापुर आ गए। हस्तिनापुर आकर देवव्रत को वहां का युवराज घोषित कर दिया। दिन खुशी-खुशी बीत रहे। हस्तिनापुर के लोग अपने युवराज को पाकर बहुत प्रसन्न थे, नगर में चहुओर खुशी का वातावरण था।

सत्यवती की कथा

एक बार शांतनु आखेट करने गए थे। वन में शिकार की खोज करते-करते बहुत दूर निकल गये। शाम हो चुकी थी रास्ता साफ दिखाई नहीं दे रहा था। तभी उन्हें एक रोशनी दिखाई दी ऐसा प्रतीत हो रहा था वहां कोई कुटिया है। महाराज शांतनु उस कुटिया के समीप जाकर अावाज दी और परिचय दिया। उस कुटिया से एक सुंदर युवती बाहर आई। परिचय पूछने पर वह युवती स्वयं को निषाद पुत्री सत्यवती बताया।

सत्यवती के रूप और यौवन को देखकर शांतनु उस पर मोहित हो गए और उसके पिता के सम्मुख अपने विवाह का प्रताव रखा। तब युवती के पिता ने एक शर्त रखी यदि मेरी पुत्री से जन्म लेने वाले संतान ही हस्तिनापुर राज्य सिंहासन का उत्तराधिकारी हो तो मैं अपनी कन्या का विवाह आपके साथ करने को तैयार हूं।

निषाद की शर्त सुनकर शांतनु ने विवाह करने से मना कर दिया और हस्तिनापुर लौट आए। उस घटना के बाद महाराज व्याकुल से रहने लगे। जब देवव्रत ने पिता से इस हालत का कारण पूछा तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। फिर देवव्रत ने मंत्री से पूरी घटना सुनकर निषाद के घर गए और पिता शांतनु के साथ विवाह के लिए उनकी पुत्री हाथ मांगा। परंतु युवती के पिता ने देवव्रत के सामने भी वही शर्त रखी। तब देवव्रत ने उन्हें ये वचन दिया कि सत्यवती की संतान ही हस्तिनापुर राज्य का उत्तराधिकारी होगा।

भीष्म प्रतिज्ञा

जब सत्यवती के पिता ने ये कहा कि यदि भविष्य में तुम्हारी संतान ने मेरी पुत्री के संतान को मारकर राज्य सिंहासन हथिया लिया तब क्या होगा। तब देवव्रत ने अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी तथा आकाश को साक्षी मानकर आजीवन ब्रह्मचर्य की अखंड प्रतिज्ञा ली देवव्रत की इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही उनका नाम भीष्म पड़ा। शांतनु सत्यवती को अपने साथ ले गए और पिता को सौंप दिया।

इच्छा मृत्यु का वरदान

पुत्र देवव्रत की आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा से महाराज शांतनु अति दुखी हुए उन्होंने पुत्र देवव्रत को अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने को कहा परन्तु देवव्रत यह कहकर प्रतिज्ञा तोड़ने से मना कर दिया की आखिर एक पिता ही अपने पुत्रों के लिए बलिदन क्यों दे, कभी पुत्र को भी अपने पिता के लिए बलिदान देना चाहिए। लोग युगों-युगों तक मेरी इस प्रतिज्ञा को याद रखेंगे।

पुत्र की बातें सुनकर महाराज शांतनु निरुत्तर हो गए और कहा तुम धन्य हो वत्स तुम अपनी इच्छा से जब तक चाहो इस पृथ्वी लोक पर रह सकते हो, मौत तुम्हें छू भी नहीं सकेगी और अपनी इच्छा से प्राण त्यागोगे ये एक पिता का आशिर्वाद है।

हस्तिनापुर की आजीवन सुरक्षा की प्रतिज्ञा

जब हस्तिनापुर नगरवासियों को देवव्रत की प्रतिज्ञा के बारे में पता चला तो वे इसका विरोध प्रकट करने के लिए महाराज शांतनु के पास पहुंच गए और उन्होंने महाराज से कहा कि आप एक स्त्री के मोह में पड़कर अपने पुत्र के साथ अन्याय कर रहे हैं। जो पुत्र अभी जन्म ही नहीं लिया उसके लिए देवव्रत से उसका अधिकार छीन रहे हैं और यदि पुत्र हुआ भी तो वह हस्तिनापुर सिंहासन के योग्य होगा इस बात की क्या संभावाना है।

महाराज शांतनु के पास नगरवासियों के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। तब देवव्रत ने हस्तिनापुर वासियों को अपनी ओर से आश्वसन दिया कि मैं हस्तिनापुर राज्य व राज्य सिंहासन पर बैठने वाले राजा की आजीवन सुरक्षा करूंगा और आपने पूर्वजों को वचन देता हूं कि हस्तिनापुर सिंहासन की ओर से मिले हर आदेश का पालन करूंगा।

महाभारत युद्ध

जब कौरव-पांडव के बीच युद्ध अनिवार्य हो गया तो कौरवों ने पितामह भीष्म को सेना नायक नियुक्त किया तथा पाण्डवों ने ध्रुपद पुत्र द्रष्टद्युम्न को अपनी सेना का प्रतिनिधित्व सौपा। चूंकि पितामह कौरव-पांडव दोनों के दादाजी थे इसलिए उन्होंने दुर्योधन से कहा कि पांचो पाण्डवों में से किसी को नहीं मारूंगा पंरतु रोज उनकी दस हजार सेना का वध करने उन्हें कमजोर कर दूंगा। दुर्योधन ना चाहते हुए भी पितामह की बात मान लेता है। महाभारत युद्ध में पितामह भीष्म ने दस दिनों तक कौरव सेना निरीक्षण किया तथा पाण्डवों के कई महारथियों समेत अनेक सैनिकों का वध किया। दूसरी तरफ गदाधारी भीम दुर्योधन के बीस भाइयों का वध कर देता।

दुर्योधन अपने भाइयों की मृत्यु का दोष पितामह पर लगाता है कि वह हमारी ओर युद्ध तो कर रहे हैं परंतु मन से पाण्डवों का साथ दे रहे हैं। दुर्योधन भीष्म पर पाण्डवों के प्रति पक्षपात का आरोप लगाते हुए उनसे सेना नायक का पद छोड़ने को कहते। मामा शकुनि और कर्ण भी दुर्योधन की बात का समर्थन किया। पितामह इस आरोप सह न सके और उन्होंने पृथ्वी को निष्पाण्डव करने की कर लेते हैं।

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